घर पह…

घर पहुँचने की जल्दी में
भूल गए हैं
जूते पायदान पर 
क्यूँ
उतार रखे थे…

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बुर्ज…

बुर्जुआ मैदान
निशाना प्रोलेतारिअत.
[२]
डाएस पे सजी 
बिसलेरी के बोतलें
बजाती क्रांति का बिगुल.
[३]
हॉल में बैठे
कुछ गरम खून
मंद हो जाने को समय की गति में.
[४]
खून के छीटों की बारिश
और फिर
एक गहरा मौन..

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यादों…

यादों से उमरती लहरों में
नहीं बनाते जिस्मों के शजर 
नौकाएँ डूब जाती हैं
अपने खो जाते हैं…..

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ज़िन्…

ज़िन्दगी एक स्वप्न है 
स्वप्न एक हकीकत
हकीकत को पाना 
सोने जैसा है.

कुछ बातें और भी हुई
जब चुप थे हम
ये भी उन बातोँ ने ही कहा है.

जलता हुआ दिया
कुछ ना कह सका
अँधेरा अब भी
बहुत दूर था…

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खोये …

खोये शब्द दौड़ चले आते हैं कहीं से
नहीं लेते पनाह य्वाकरण के रंगमंच का
और ना ही कोई लालच ज़िन्दगी को परिभाषित ही करने की.

एक छोटी लड़की
मेले से लायी एक बड़ी गुडिया
अपने गोद में बिठाये 
उन खरीदारों को ताक रही है 
जिनमें कुछ
भारत के ‘स्वर्णिम’ और ‘महाशक्ति’
होने की चर्चा कर रहें हैं..

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आवाज़ …

आवाज़ में भी एक सन्नाटा
कुत्तो को जैसे आदत सी हो गयी थी
सुनसान गलियों में भौकने की
लेम्प- पोस्ट की पीली रौशनी में
खोता वजूद वो शहर
और इस क्रम को तोडती 
टाइप रायटर के टक- टक 
और कुछ पन्नो के
पलटने की आवाज़…

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होता, …

होता, बनता 
बिगड़ता, हूँ.

बातें टूटतीं बनती 
हलक से आसमान को जातीं.

लोग, दायरे
और दायरे पे होतीं मुलाकातें.

एक राहगुजर
छाता ताने बूंदों से
बचने की कोशिश 
करता हुआ.
[ मोर्निंग हेडेक ]

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